थैंक यू...! दयाराम...!

ठाले बैठे... बस यूं ही... पत्थरदिल शहर में किसी की आत्मियता पाना, मनचाहा दूसरा जीवन पाने से कम नहीं है। दयाराम जैसे लोग कहां मिलते हैं आसानी से। संवेदनाएं, भावनाएं, आत्मियता, स्नेह, आत्मसम्मान और उम्मीद, हम टीवी वाले सिर्फ़ ख़बरों में ही ढ़ूंढ पाते हैं। आपस में इन मूल्यों के साथ... [पूरी पोस्ट]
writer अनुराग मुस्कान
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[08 Jun 2010 21:23 PM]

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