थोड़े देते कष्ट मुझे तो मैं भी रहती नारी....(एक सुखी नारी कि व्यथा)
व्यथा हृदय की किसे सुनाऊं शोकाकुल ये मन है...कभी जहाँ सुख नाद गूँजता अब बस सूनापन है...जन्म हुआ जब मेरा, घर का सूना आँगन महका...अम्मा बाबा दोनो का ही अंतर्मन था चहका...इच्छा भी न कर पाती और चीज़ सामने होती...कभी बहे न इन आँखों से दुख के खारे मोती...बचपन...
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दिलीप
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[08 Jun 2010 14:13 PM]



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