ग़ज़ल: दरख़्त

अशोकनामा Shareसूखे पत्तों को जब आकर हवा उड़ाती हैशाख के पत्तों की भी रूह कांप जाती हैदरख़्त अपने ही पत्तों का हो नहीं पाताचिड़िया पागल है वहां घोंसला बनाती हैधूप पेड़ों के सिर जमाती जब डेरा आकर ये छांव पेड़ों तले तब बस्तियां बसाती हैदरख़्त जो भी खास थे वो बन गये खुदाआम... [पूरी पोस्ट]
writer अशोक जमनानी

ashok jamnani

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[08 Jun 2010 11:35 AM]

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