बंद पड़ी मिल

ज्ञानघर हर बार चाहता हूंचुपचाप निकल जाना,लेकिन हाहाकार लिएलौटता हूं हर बार।बंद पड़ी मिल मेंगरीबी की चुड़ैलें बेखौफ नाचती हैं।अभाव के विजयी भूतही...ही...ही...करते हैं।बंद सूता मिल के एक पोर्च मेंवर्षों से खड़ी है अकेली गाड़ी,कब के भाग गए ड्राइवरभाग गई सवारी।हर... [पूरी पोस्ट]
writer ज्ञानेश उपाध्याय (gyanesh upadhyay)

कविता

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[08 Jun 2010 10:59 AM]

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