“व्यञ्जनावली-पवर्ग” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)
कल अन्तस्थ और परसों ऊष्म पर मुक्तक लगाने है!उसके बाद फिर से अपने रंग में आ जाऊँगा!"प""प" से पर्वत और पतंग!पत्थर हैं पहाड़ के अंग!मानो तो ये महादेव हैं, बहुत निराले इनके ढंग!! "फ"फ से फल गुण का भण्डार!फल सबसे अच्छा आहार!फ से बन जाता फव्वारा,...
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डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
कविता
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[08 Jun 2010 10:21 AM]



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