“मधुमक्खी है नाम तुम्हारा!” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)
मधुमक्खी मधुमक्खी है नाम तुम्हारा। शहद बनाती कितना सारा।। अपने छत्ते में रखती हो। कभी नही इसको चखती हो।। कंजूसी इतनी करती हो। रोज तिजोरी को भरती हो।। दान-पुण्य का काम नही है। दया-धर्म का नाम नही है।। इक दिन डाका पड़ जायेगा। शहद-मोम सब उड़ जायेगा।। मिट...
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डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
बालकविता
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[08 Jun 2010 00:15 AM]



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