मेरी धरती
तुम जलती हो ,जो धूप मै देता हूँ.तुम भीगती हो,जो पानी मै उडेलता हूँ.तुम कांपती हो,जो शीत मै फैलता हूँ.सबकुछ समेटती हो,जो मै बिखेरता हूँ.तुम सहती होबिना किसी शिकायत केमेरी धरती,तुम रचती हो,सृष्टि गढ़ती होऔर मै तुम्हारा आकाशतुम्हे बाहों में भरे...
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DR. PAWAN K MISHRA
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[07 Jun 2010 23:00 PM]



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