अशोक जमनानी की ग़ज़ल- परिंदों लौट आना

अपनी माटी Share   परिंदों शाम को लौट आना घर ज़रा ज़ल्दी हम दीवारें इस ख़ामोशी से ऊब जातीं हैंउतने ही दानें चुनो जितनी ज़रूरत है हमें यहां कितनी चोंचें घोंसलों  में रीती आतीं हैंजुगनुओं से कह दो ना रात में चमका करें वो रोशनी महलों की इससे खीज जाती हैउनसे ना... [पूरी पोस्ट]
writer माणिक

sahitya

views
3
upvote
0
downvote
0
rating
0
comments
0
[07 Jun 2010 05:01 AM]

Free Vedic Astrology From Astrobix