अनामिका की नई कविता
Share हे उद्धो ...मत जिरह करोउस छलिया कीजिसने भ्रमर रूप रखहम संग प्रीत बढ़ाईऔर अब हमारीहर रात परपत्थर फैंक करजाता है ...मन को जख्मीकरता है ..हमारे अंतस परउसी का पहरा है.द्रगांचल परजाले बुन दिए हैं ..अपनी लिलाओं के उसने. .हमारे वजूद कीअट्टालिका सेवो...
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माणिक
sahitya
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[07 Jun 2010 05:01 AM]



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