बात है कुछ रोज़ पहले की.....
बात है कुछ रोज़ पहले की, टेढ़ी मेढी पगडंदियों से गुज़र रहा था...भोर होने वाली थी, पूरब से सूरज का मद्धम प्रकाश बिखर रहा था...पतझड़ के सताए, एक बूढ़े बरगद के नीचे, अचानक ठिठक गया...उन सूखी, बढ़ती उम्र की निशानी, दाढियों मे, मेरा मन अटक गया...उस विशालकाय...
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दिलीप
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[07 Jun 2010 12:59 PM]



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