संजय व्यास की कविता - चौथी किस्त
बस की लय को पकड़ते हुएये बस दो रेगिस्तानी जिला मुख्यालयों को जोडती हैजो दिन में शहर और रात में गाँव हो जाते हैसुबह ये शहर का सपना लिए जगते हैं और रात को सन्नाटा लिए सो जातें हैंइनके बीच सदियों का मौन हैं, सिर्फ कहीं कहीं जीवन तो कहीं इतिहास मुखर हैं।बस की...
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शिरीष कुमार मौर्य
युवा कविता
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[07 Jun 2010 11:59 AM]



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