कुछ लघु कविताएं- क्षणिकाएं
अबला जब तक तुम अपने आप को दूसरों के दर्पण मे देखना चाहोगी। तुम अबला ही कहलाओगी। ******************* प्रेम या कर्ज तुम को सँवारनें मे मैने अपना जीवन होम कर दिया। अपनी खुशीयां देकर तुम्हारा गम लिआ। वह प्रेम था तो..... इस बात को भूल जाओ। कर्ज था तो.... अपनी...
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परमजीत सिँह बाली
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[06 Jun 2010 21:00 PM]



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