इरोम शर्मीला
बेक़सूर लहू धरती काआँचल रंग जाता है,और औरतों की अस्मतका खिलौना बन जाता है......किससे करे फरियाद..?ये प्रश्न सिर उठता है,जब रक्षक ही भक्षक कीतरह सामने आता है ......तब-जब दर्द हद से,गुज़र जाता है .....आँखों से बहता नहींसूख जाता है .....दिल में एक आक्रोश...
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Jyotsna Pandey
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[07 Jun 2010 11:20 AM]



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