हिंसा की देवी,तुम सुन रही हो न..?
दो नई कविताएँ (१)हिंसा की देवी, तुम सुन रही हो न..? हिंसा की देवी, तुम सुन रही हो न..? जब तुम अपने कोमल होंठों से गाती हो हिंसा के गीत तब लगता है, एक सुन्दर फूलकाँटों के साथ मिल कर अपने ही फूलो के जिस्मो को छलनी कर रहा है.ओ...
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girish pankaj
गिरीश पंकज
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[07 Jun 2010 05:35 AM]



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