ममता, राघव, प्रणब तो मोहरे हैं बेदाम ...

साहित्यशिल्पी.इन आम आदमी भूख से, जितना हो बेजार. सह लेगा मनमानियाँ, होकर चुप लाचार.. राजनीति है स्वार्थ का सौदा, सेवा नाम. बेच-खरीदे देश को, खुद रहकर बेनाम.. ममता राघव प्रणब तो मोहरे हैं बेदाम. सेठ और अफसर मिले, कमा रहे हैं दाम.. अतिरिक्त...... [पूरी पोस्ट]
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[07 Jun 2010 04:31 AM]

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