बेहिसाब मौसम के लिये बाबा नागार्जुन की कविता – कल और आज

नई बात बाबा नागार्जुन की यह कविता बचपन में पढ़ी थी. उस समय, याद है, इसके शीर्षक में उलझ गया था. मतलब दिमाग यह मानने को तैयार नही होता था कि एक दिन में इतना परिवर्तन कैसे आ सकता है? अभी जब इसे दुबारा पढ़ रहा था तो स्पष्ट हुआ कि ये जो ’कल’ है वो बहुत लम्बा वक्फा है... [पूरी पोस्ट]
writer चन्दन

कविता

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[07 Jun 2010 04:52 AM]

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