क्यूं दबे हैं स्वर समूचे
जो नजर आता नहीं क्या वो सब गौण हैं
मंच की मर्यादा निर्भर इस पर
नैथप्य में कौन हैं सींचता है बाली बाली
अपने पसीने खून से
शीत, ग्रीष्म से लडता
और बेरुखे मौनसून से
घर भरते बिचोलियों के
होता हर दर साल है
किसान के हिस्से दाने कहां
आता सिर्फ़ पुआल है
खाद और बीज...
[पूरी पोस्ट]
मोहिन्दर कुमार
15
0
0
0
6
[07 Jun 2010 03:47 AM]



Shuffle








