मुश्किलों का गणित ये कैसा है

नीरज हाल बेताब हों रुलाने कोतू मचल कहकहे लगाने को मुश्किलों का गणित ये कैसा हैबढ़ गयीं जब चला घटाने को दौड़ हम हारते नहीं लेकिनथम गये थे तुझे उठाने को सांस लेना मुहाल कर देगा सर चढ़ाया अगर ज़माने को बिजलियों का है खौफ़ गर तारी भूल जा आशियाँ बनाने को हमसे दम... [पूरी पोस्ट]
writer नीरज गोस्वामी
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[07 Jun 2010 00:35 AM]

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