जंगल
बूढे पेड़ों की शाखों पर
अब भी हलचल
कुछ चिडियों के डेरे हैं चीर फ़कीर के
सदियों तपे धूप में
फटे ताने हैं
खोखल कहो भले ही
जीवन अमृत भरे कमंडल
पिए गिलहरी
अपनी जात...
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Pinaakpaani
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[31 May 2010 13:17 PM]



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