दंश

पिनाकपाणि तब , दिन थे बस दिन रातें थीं  बस रात  था सहारा का अनंत विस्तार  और "मैं "नहीं था  अब  दिन हैं पर नहीं हैं , रातें कभी कभी होती हैं  टुकड़े टुकड़े चमकीली  बहुत चुभता है ....कई बार  जुगनू का बाना  कभी कभी "होना... [पूरी पोस्ट]
writer Pinaakpaani
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[31 May 2010 13:13 PM]

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