गहन व्यथाओं का गंगाजल
थके दिवस की नजरें आ जब खड़कातीं सुधियों की साँकलआंजुरि में तब भर जाता है गहन व्यथाओं का गंगाजलरह रह दंश लगाया करतींनागफ़नी उग उग कर मन मेंनयनसुधा बस साथ निभायाकरती है एकान्त विजन मेंसम्बन्धों में बसी निकटता के बिम्बों की बढ़ती दूरीमें उलझा आभास और तो कुछ भी...
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राकेश खंडेलवाल
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[06 Jun 2010 22:05 PM]



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