पसीने की धारा-हिन्दी व्यंग्य कवितायें

 हिन्द केसरी-पत्रिका कभी मेरे बहते हुए पसीने पर तुम तरस न खाना, यह मेरे इरादे पूरे करने के लिये बह रहा है मीठे जल की तरह, इसकी बदबू तुम्हें तब सुगंध लगेगी जब मकसद समझ जाओगे। सिमट रहा है ज़माना वातानुकुलित कमरे में सूरज की तपती गर्मी से लड़ने पर जिंदगी थक कर आराम से सो जाती,... [पूरी पोस्ट]
writer दीपक भारतदीप

अभिव्यक्तिअनुभूतिशब्ददीपक भारतदीप

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[06 Jun 2010 12:57 PM]

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