गिरगिट

कस्बे का कवि... रंग बदल रहा हैगिरगिटपेड़ पर बैठा हुआजबड़ों से ज्यादा खतरनाक हैंउसके रंगहरे पत्तों के बीचएकदम हरियल हो जाता हैजमीन तक आते-आतेएकदम भूरापेट भर चुका है उसकाघर लौट रहा है गिरगिटशाम के पाँच बजे हैं अभीपता नहींकिस रंग मेंप्यार करेगा अपनी मादा कोपता नहीं किस रंग... [पूरी पोस्ट]
writer मणिमोहन
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[06 Jun 2010 10:43 AM]

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