चुकाओ ग्रीष्म का कर्जा ...सजल जलधर से घिर आओ|

मन वृन्दावन सरस घनश्याम आ जाओ! तरणि के ताप से व्याकुल धरा की गोद जलती है दिशाएँ तप रहीं लू से हवाएं गर्म चलती हैं| निराश्रित वृद्ध सी दोपहर कुंवारी साध सी ढलती बढ़ी आ रही गर्मी अब सरासर सीढियां चढ़तीं| ये कैसी उठ रही लपटें असहनीय दर्द सी चुभती उधर अम्बर सुलगता है धरा... [पूरी पोस्ट]
writer Deepa Pant
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[06 Jun 2010 08:54 AM]

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