वर्षा ऋतु से..
वह मद्धिम करार भी टूट चुका वर्षा रानी ये जिद छोड़ोबादलों की धार फोड़ो तुम्हारी जल पंखुड़ियाँ धरती को सरोबार जब चूमेंगीसहसा, तुम्हारी बूँदे निगाह बन उसे ढ़ूँढ़ेंगी जो अब नही होगी वहाँ आंगन के पार द्वार पर तैयार वर्षों वर्षों तक हमने हथेलियों में थामें हाथ किया...
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चन्दन
कविता
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[06 Jun 2010 06:53 AM]



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