मेरा नाम अब मेरे पास था
शाम भी ढलने को थी मन हो रहा था बोझिल मेरा तो सोचा क़ि क्यूँ ना जाऊं समुंदर के तट पर और वहाँ डूब रहे सूरज को, निहारूं देर तक, खेलूँ ताजी हवा के संग फिर मैं वहाँ गया भी| पर अरे ये क्या, यहाँ तो मेरा नाम लिखा है किसी ने इस रेत के घरौंदे के पास, जो कि बनाया...
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sanu shukla
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[06 Jun 2010 02:42 AM]



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