वैभव पाकर मत इतराओ

कवि बाबा कानपुरी भोला था मन का सच्चा था,प्यारा था जब तक बच्चा थाकरता था वो बातें सच्ची,जबतक अकल से वो कच्चा थाबड़ा हुआ करता नादानी ,गढ़ता अपनी राम कहानीकिये नीर के टुकड़े-टुकड़े,देख मुझे होती हैरानीकहता ये केदार का पानी,लाया 'गया' बिहार का पानीये जमजम का यह संगम का,निर्मल... [पूरी पोस्ट]
writer Baba Kanpuri
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[06 Jun 2010 02:27 AM]

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