अपने ही समाज के बीच से निकलती हुई दो-दो लाइनों की कुछ फुलझड़ियाँ-6-----(विनोद कुमार पांडेय)

मुस्कुराते पल-कुछ सच कुछ सपने कहूँ बड़ों को क्यों भला,छोटे भी है तेज|संस्कार से वो सभी,हैं करते परहेज||बाबू माँ की बात का,तनिक नही सम्मान|उल्टे कामों में सदा,रहता उनका ध्यान||लाल कलर टी- शर्ट पर,काला-नीला शूज|जींस छोड़ कर देह पर,बाकी सब कुछ लूज|गाँव-मोहल्ला तंग है,ऐसे सुंदर... [पूरी पोस्ट]
writer विनोद कुमार पांडेय
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[05 Jun 2010 23:26 PM]

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