कविता : ख्वाब
सोचता हूँ वो इंतज़ार करती होगी, अपने आप से बातें दो चार करती होगी ।छुप छुप कर अकेले में अपने रूप को, आईने में निहारती सवाँरती हर शाम होगी ॥दिल की धड़कन उसकी मेरी गुलाम होगी,खवाब से मेरे हर रात वो परेशान होगी ।मिलन का ख्वाब भोर में देखकर, सखियों से शरमाकर...
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Deepak Kumar
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[05 Jun 2010 23:26 PM]



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