सुनो… मुझे तुम्हारी ये बातें अच्छी लगती हैं.
वो शायद जुलाई की शाम थी या अगस्त की…याद नहीं. हम यूँ ही बातें करने की जगह ढूँढते-ढूँढते सरस्वती घाट पहुँच गए थे. वो जगह खूबसूरत है और हमारी मजबूरी भी क्योंकि इलाहाबाद में घूमने-फिरने के लिए इनी-गिनी जगहों में से एक है. उन दिनों मैं जबरदस्त इमोशनल...
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aradhana
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[05 Jun 2010 23:16 PM]



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