मैं हूं औरतज़ात, है मेरा........
लीजिये संडे है आजसमझ में नहीं आ रहा है कि क्या लिखूंदिमाग भी लगता है छुट्टी पर हैफिर भी आदतन कुछ पुरानी पंक्तियांप्रस्तुत करता हूंकाग़ज़, कलम, दवात का रिश्तासमझो तो जज्ब़ात का रिश्तामैं हूं औरतज़ात, है मेराभरे उजाले, रात का रिश्तामजदूरी, क्या मांग ली...
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योगेन्द्र मौदगिल
ग़ज़ल
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[05 Jun 2010 21:59 PM]



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