कान नहीं होते [कविता] - ज़कीया ज़ुबैरी

साहित्यशिल्पी.इन कार की दीवारों के कान नहीं होते। घर की दीवारें कमज़ोर हैं रोक नहीं पातीं ख़ुफ़िया आवाज़ों को। सुनने वाले कान तेज़ हैं.. बहुत तेज़ पतले फुर्तीले कान! अतिरिक्त...... [पूरी पोस्ट]
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[05 Jun 2010 20:30 PM]

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