“व्यञ्जनावली-चवर्ग” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)
"च""च" से चन्दा-चम्मच-चमचम!चरखा सूत कातता हरदम!सरदी, गरमी और वर्षा का, बदल-बदल कर आता मौसम!! "छ""छ" से छतरी सदा लगाओ!छत पर मत तुम पतंग उड़ाओ!छम-छम बारिश जब आती हो, झट इसके नीचे छिप जाओ!! "ज""ज" से जड़ और लिखो जहाज!सागर पार करो तुम आज!पानी पर सरपट चलता...
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डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
कविता
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[05 Jun 2010 20:43 PM]



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