तुम मुझको, मैं तुम्हें सुलाऊँ
तुम मुझको, मैं तुम्हें सुलाऊँ भाग्य रूठ कर कहीं पड़ा हो जग, बिसरा कर दूर खड़ा हो तेरे नयनों की बाती से मन का दीप जलाऊँ तुम मुझको, मैं तुम्हें सुलाऊँ जब अनजाने भय से मन धड़के कहीं कोई पत्ता न खड़के नींद कहे मैं हुई पराई, वापस कभी ना आऊँ तुम मुझको, मैं...
[पूरी पोस्ट]
योगेश शर्मा
11
0
0
0
6
[05 Jun 2010 09:31 AM]



Shuffle








