खड़े जहाँ पर ठूँठ
रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ खड़े जहाँ पर ठूँठ कभी यहाँ पेड़ हुआ करते थे।सूखी तपतीइस घाटी में कभी झरने झरते थे । छाया के बैरी थे लाखों लम्पट ठेकेदार , मिली-भगत सब लील गई थी नदियाँ पानीदार । अब है सूखी झील कभी यहाँ- पनडुब्बा तिरते थे । बदल गए हैं मौसम सारे...
[पूरी पोस्ट]
सहज साहित्य
8
0
0
0
3
[05 Jun 2010 08:38 AM]



Shuffle








