रमकलिया की जात न पूछो
BODY { MARGIN: 8px } .LW-yrriRe { FONT: x-small arial } कई दिनों से जाति के नाम पर विमर्श चल रहा है। इसी सन्दर्भ में अचानक ही अपनी एक पुरानी कविता याद आ गई। ९० के दशक में इंदौर के साहित्यिक मित्रों के बीच यह काफी लोकप्रिय हुआ करती थी और गोष्ठियों में...
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Arun Aditya
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[05 Jun 2010 06:27 AM]



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