तुम्हारी कसम मै जहाँ छोड़ जाऊं.................अरशद अली
खुला राज तो तेरी रुसवाई होगी मै राजे मुहब्बत निहाँ छोड़ जाऊं जिसे खूने दिल से मै लिखता रहा हूँ अधूरी हीं वो दास्ताँ छोड़ जाऊं मेरा ख़ून जो तेरे दर पे गिरेगातो फिर हश्र तक भी नहीं उठ सकेगा मै ये सोंचता हूँ की टकरा के सर को तेरे दर पे अपनी निशान छोड़ जाऊं...
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Arshad Ali
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[05 Jun 2010 03:32 AM]



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