इत्तफ़ाकन जो हँस लिया हमने, इंतकामन उदास रहते हैं

अस्तित्व ऐसा शायद होता ही होगा.... तभी तो उत्सव से जुड़ता है अवसाद। क्या होता होगा इसका मनोविज्ञान.....? क्यों होता है, ऐसा कि जमकर उत्सव मनाने के बाद समापन के साथ ही गाढ़ी-सी उदासी........ न जाने कहाँ से चुपके से आ जाती है.... करने लगती है चीरफाड़, उस सबकी, जिसे... [पूरी पोस्ट]
writer डॉ. अमिता नीरव
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[05 Jun 2010 01:30 AM]

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