वीरान धरती एवं पेड़ों की लाशें
(1) सुबह सुबह उठकर दौडाता हूँ नजर, अपने घर की चार दीवारी के भीतर सजाये हुए हरे भरे बगीचे की ओरअरे! यहाँ तो मुरझा गये हैं पेड़, हरी हरी दूब सूखी घास हो गई...
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सूर्यकान्त गुप्ता
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[05 Jun 2010 00:35 AM]



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