ऐसा जिसे प्यार कहा नहीं जा सकता

प्रत्यक्षा नदी बनती है , पहाड़ बनता है तुम बनते हो प्यार बनता है ***तुम्हें चूमना खुद को चूमना होता है तुम्हें छूना खुद को , आईने में तुम देखते हो जिधर मैं भी वहीं देखती हूँ ***रात में तकिये के नीचे तुम्हारी आवाज़ सिरहाने *** कँधे से कँधे सटाये साथ बैठना सिर्फ और कुछ... [पूरी पोस्ट]
writer Pratyaksha
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[05 Jun 2010 00:09 AM]

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