'बावरा सा घूमता है'
बावरा सा घूमता है हर कली को चूमता है पंखुरी से लिपट कर के छोड़ देता अधर धर के उसको न रस की कामना है बस, उस कली को ढूँढना है बंद जिसकी पंखुरी में,बीती थी कल रात सारी, वो कली थी कितनी प्यारी, रूप उसका, दमक उसकी, स्पर्श औ रस गंध उसकी,...
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योगेश शर्मा
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[04 Jun 2010 23:43 PM]



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