सब संताप हर दें [कविता] - प्रवीण शुक्ला
आओ हम मिल मिला कर सब संताप हर दें बुझ चुकी समता मशालो में फिर ताप भर दें राष्ट्र की गरिमा पुनः उत्थान की सीढ़ी चढ़े रहमान के रहबर बढें और राम की पीढ़ी बढे समता का ऐसा रंग हम जन जन में घोल दें हिन्दू नमाजें पढ़ें और मुस्लिम जय बोल दें धर्म की लकीरें मिटे और...
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[04 Jun 2010 20:30 PM]



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