'बावरा....वो भंवरा'
बावरा सा घूमता है हर कली को चूमता है पंखुरी से लिपट कर के छोड़ देता अधर धर के उसको न रस की कामना है बस उस कली को ढूँढना है बंद जिसकी पंखुरी मेंबीती थी कल रात सारी वो कली थी कितनी प्यारी रूप उसका, दमक उसकी स्पर्श औ रस गंध उसकी मदमस्त सी करती गयीरात ज्यों...
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योगेश शर्मा
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[04 Jun 2010 09:38 AM]



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