“स्वरावलि” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
"अ" ‘‘अ‘’ से अल्पज्ञ सब, ओम् सर्वज्ञ है। ओम् का जाप, सबसे बड़ा यज्ञ है।। ‘‘आ’’ ‘‘आ’’ से आदि न जिसका, कोई अन्त है। सारी दुनिया का आराध्य, वह सन्त है।। ‘‘इ’’ ‘‘इ’’ से इमली खटाई भरी, खान है। खट्टा होना खतरनाक, पहचान...
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डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
कविता
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[04 Jun 2010 07:49 AM]



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