......आओगी तुम मुस्कराकर
बीता रात का तीसरा पहरतुम नहीं आयेआधा हुआ चंदा पिघलकरतुम नहीं आयेमै अकेला हूँ यहाँ परयादो की चादर ओढ़कररात भर पीता रहा ह ओस में चांदनी घोलकरफूल खिले है ताजे या तुमअपने होठ भिगोये होहवा हुयी है गीली सी क्योंशायद तुम भी रोये होअब सही जाती...
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DR. PAWAN K MISHRA
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[04 Jun 2010 06:30 AM]



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