हिन्दी में ग़ज़ल कहने का है स्वाद ही कुछ और्
हिन्दी में ग़ज़ल कहने का है स्वाद ही कुछ और्।रचनाओं में होता है यहाँ नाद ही कुछ और्॥आशीष दिया करती है माँ सुख से रहूँ मैं,पर मुझसे समय करता है संवाद ही कुछ और्।सीताओं की होती है यहाँ अग्नि परीक्षा,राधाओं के है प्यार की मर्याद ही कुछ और्।वह आँखें हैं...
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युग-विमर्श
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[03 Jun 2010 20:52 PM]



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