ब्लॉग की ज़मीं आज करबला सी है .....

काव्य मंजूषा अब इस घर में अजब उदासी है ख़ुशी तो है पर बहुत ज़रा सी है जाने कितने राह भटक रहे हैं ये और कुछ नहीं बदहवासी है कहना है उनसे न करो तार-तारकल ही तो रिश्तों की क़बा सी है अहमकी के हक़ पर हो रहा यलग़ारब्लॉग की ज़मीं आज करबला सी है क़बा = ढीला... [पूरी पोस्ट]
writer 'अदा'
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[03 Jun 2010 19:29 PM]

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