मेरे भाई ! सुनो...
जो रानीखेत में अब तक, मेरे हमदम नहीं होते,बर्फ, बादल, हवा, बरिश, हसीं मौसम नहीं होते.फ़लक में कैद हैं बादल, हरे हों किस तरह चेहरे?फ़कत दो बूँद आंसू से,ये सेहरा नम नहीं होते.रूहानी सी दुआ हैं, आपकी अंगड़ाईयाँ बेशक.बदन से टूटकर फ़िर क्यूँ, ये तारे कम नहीं...
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दर्पण साह 'दर्शन'
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[03 Jun 2010 13:59 PM]



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