अभिव्यक्ति की 'तेरी-मेरी', तो मौलिक हक कहां?
यों तो साहित्य समाज का दर्पण माना जाता। पर जबसे साहित्य में नेताओं की घुसपैठ हो गई। तबसे सिर्फ हल्ला ही मच रहा। कहीं कोरी कल्पना, तो कहीं कल्पना-हकीकत का तडक़ा मार घालमेल। फिर वोट के हिसाब से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का जुमला। अब ताजा विवाद सोनिया गांधी...
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santosh.indiagatese
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[03 Jun 2010 12:04 PM]



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