जमाना !

अंधड़ ! क्या ज़माना आ गया कि आईने में उभरतेअपने ही अक्श का संज्ञान नंगे नहीं लेते,सरे राह किसी को एक रूपये का सिक्काभीख में देना चाहो,तो भिखमंगे नहीं लेते !गली से गुजरती इक मस्त-बयार कह रही थीकि ये दुनिया सचमुच में बहुत खराब हो गई,इसीलिये हम आजकल किसी से पंगे... [पूरी पोस्ट]
writer पी.सी.गोदियाल

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[03 Jun 2010 09:41 AM]

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